हाल ही में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के उस आदेश में हस्तक्षेप करने से स्पष्ट रूप से इनकार कर दिया है, जिसमें प्रयागराज के मोतीलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज से जुड़े सरकारी डॉक्टरों की निजी प्रैक्टिस की उच्च स्तरीय जांच के निर्देश दिए गए थे। यह मामला सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली और चिकित्सकों द्वारा चलाए जा रहे 'समानांतर स्वास्थ्य सेवा प्रणाली' (Parallel Healthcare System) के गंभीर मुद्दे को उजागर करता है।
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई और सख्त टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ के समक्ष मेडिकल कॉलेज के सर्जरी विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. संतोष कुमार सिंह ने एक विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर की थी। डॉ. सिंह के वकील, वरिष्ठ अधिवक्ता हर्षवीर प्रताप शर्मा ने यह तर्क दिया कि उनके मुवक्किल उच्च न्यायालय की कार्यवाही का हिस्सा नहीं थे और उच्च न्यायालय ने एक व्यक्तिगत विवाद से संबंधित एफआईआर (FIR) के आधार पर आदेश पारित किया है।
हालांकि, न्यायमूर्ति नागरत्ना ने इस तर्क को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि उच्च न्यायालय एक बहुत बड़े 'सार्वजनिक मुद्दे' पर विचार कर रहा है। उन्होंने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा, "यह एक बहुत अच्छा कारण है क्योंकि सरकारी डॉक्टरों को ऐसा नहीं करना चाहिए और आप भी एक डॉक्टर हैं"। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यह जांच व्यक्तिगत रूप से डॉ. सिंह के खिलाफ निर्देशित नहीं है, बल्कि उन सभी डॉक्टरों के खिलाफ है जो प्रतिबंध के बावजूद निजी प्रैक्टिस में लिप्त हैं। पीठ के कड़े रुख और किसी भी प्रकार की विशेष छूट देने से इनकार करने के बाद, याचिकाकर्ता को अपनी याचिका वापस लेनी पड़ी।
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समानांतर स्वास्थ्य प्रणाली और मरीजों का शोषण
यह पूरा विवाद इलाहाबाद उच्च न्यायालय में मोतीलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज और स्वरूप रानी नेहरू (SRN) अस्पताल, प्रयागराज की स्थिति को लेकर चल रही जनहित याचिका (PIL) से उत्पन्न हुआ है। यह जनहित याचिका मूल रूप से एक अन्य सरकारी डॉक्टर द्वारा प्रतिबंध के बावजूद निजी अस्पताल में मरीजों का इलाज करने के आरोपों के साथ शुरू हुई थी।
4 मई 2026 को, उच्च न्यायालय ने डॉ. संतोष कुमार सिंह और उनकी पत्नी के खिलाफ दर्ज एक एफआईआर का संज्ञान लिया। न्यायालय को सूचित किया गया कि डॉ. सिंह की पत्नी 'आरा अस्पताल' (Aura Hospital) नामक एक निजी नर्सिंग होम की निदेशक हैं, जहां डॉ. सिंह कथित तौर पर सर्जरी किया करते थे। इस पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए, उच्च न्यायालय ने कहा कि मेडिकल कॉलेज के प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर और लेक्चरर निजी नर्सिंग होम में प्रैक्टिस कर रहे हैं और प्रयागराज शहर में एक 'समानांतर चिकित्सा उद्योग' चला रहे हैं। सरकारी अस्पताल में आने वाले मरीजों को निजी प्रतिष्ठानों में स्थानांतरित किया जा रहा है और वहां डॉक्टरों द्वारा उनकी सर्जरी की जा रही है।
संसाधनों की कमी नहीं, व्यवस्था और डॉक्टरों की विफलता
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अपनी कड़ी टिप्पणी में कहा कि मोतीलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज और उससे जुड़े स्वरूप रानी नेहरू अस्पताल की हालत इसलिए नहीं बिगड़ी है कि सरकार द्वारा धन या सुविधाओं की कमी है। बल्कि, यह चिकित्सा बिरादरी है जो सरकार के उद्देश्यों को विफल कर रही है।
अदालत अस्पताल की खराब स्थिति के साथ-साथ बुनियादी ढांचे के निर्माण में हो रही अत्यधिक देरी की भी निगरानी कर रही है। न्यायालय ने इस बात पर भी गौर किया कि कार्डियोलॉजी विभाग की दो मंजिलों का निर्माण 2006 में शुरू होने और सरकार द्वारा फंड जारी किए जाने के बावजूद आज तक अधूरा पड़ा है।
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मुख्य सचिव को उच्च स्तरीय जांच के निर्देश
न्यायालय ने यह भी ध्यान दिलाया कि ऐसे आरोप पहले भी सामने आ चुके हैं और जिलाधिकारी से मांगी गई रिपोर्ट भी कभी दाखिल नहीं की गई। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए, उच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव को कड़ी कार्रवाई करने और मेडिकल कॉलेज में निजी प्रैक्टिस करने वाले डॉक्टरों के खिलाफ उच्च स्तरीय जांच स्थापित करने का निर्देश दिया है। इसके साथ ही मुख्य सचिव को अस्पताल में चल रहे निर्माण कार्यों की निगरानी करने का भी आदेश दिया गया है।
यह मामला (केस शीर्षक: संतोष कुमार सिंह बनाम अरविंद गुप्ता एवं अन्य, SLP सिविल डायरी नंबर 32125/2026) सरकारी स्वास्थ्य तंत्र की जवाबदेही तय करने और डॉक्टरों द्वारा नियमों के उल्लंघन को रोकने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।

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